पीड़ारहित मौत की की कोई बराबरी नहीं है – चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा

सुप्रीम कोर्ट में वकील ऋषि मल्होत्रा द्वारा दाखिल याचिका में कहा गया है कि फांसी की जगह मौत की सज़ा के लिए किसी दूसरे विकल्प को अपनाया जाना चाहिए क्योकि फांसी से मौत में 40 मिनट लगते हैं जो बर्बर तरीका है। उन्होंने अपने याचिका के समर्थन में पूर्व न्याय निर्णयों को प्रस्तुत किया है।
ईनमे ज्ञान कौर बनाम पंजाब के केश में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि जीवन जीने के मौलिक अधिकारों में सम्मान से मरने का भी अधिकार है। अर्थात मरने की प्रक्रिया भी सम्मानजनक होनी चाहिए।




दीना बनाम भारत संघ वाले एक और मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मौत की सजा का तरीका ऐसा हो जिससे मौत जल्दी हो। यह भी कि तरीका आसान होना चाहिए ताकि इससे कैदी की मार्मिकता और ना बढ़े। यह तरीका इस प्रकार होना चाहिए जिससे जल्दी मौत हो और इसमें अंग-भंग ना हो।
याचिककर्ता ने मांग की कि फांसी पर लटकाए रखने वाले प्रावधान दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 354 (5) को संविधान के अनुच्छेद 21 के परिपेक्ष में असंवैधानिक करार दिया जाए और इसे ज्ञान कौर जजमेंट के विपरीत माना जाए। इसी के साथ सम्मानजनक तरीके से मौत के अधिकार को अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार का दर्जा दिया जाए।




सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पिंकी आनंद ने चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की बेंच को कहा कि इस मुद्दे पर सरकार को कुछ और वक्त चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस ए. एम. खानवेलकर और जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड की बेंच ने केंद्र सरकार को पिछले सप्ताह नोटिस जारी कर पूछा कि मौत की सजा में फांसी के अलावा कोई अन्य तरीका भी हो सकता है क्या ?
फांसी की सजा का कोई विकल्प हो सकता है क्या इस प्रश्न पर कोर्ट ने कहा है कि विधायिका सजाए मौत के मामले में फांसी के अलावा कोई दूसरा तरीका भी तलाशे। जस्टिस मिश्रा ने कहा कि यह स्थापित विश्वास है कि हमारे संविधान की प्रवृत्ति दयालु है। ऐसे में वर्तमान के विज्ञान के माध्यम से मौत की दूसरी पद्धति पर भी विचार किया जाना चाहिए। यहां हम आपको बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हम मौत की सजा पर बहस नहीं कर रहे हैं।



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